राम काज करीबे को
आतूर
-- आनंद
हनुमान, श्रीराम के भक्त
भी है और हम सबके भगवान भी। कहते है की भक्ति कैसी ?, तो हनुमान जैसी और
भगवान कैसे ?, तो वह भी हनुमान जैसे।कैसा आश्चर्य है ! एक ही आदर्श के दो रूप ! हनुमान के दर्शन करना, उन्हें तेल चढ़ाना, नियमित रूप में पूजा-अर्चना करना, शनिवार को समूह में हनुमान चालिसा के पाठ करना, यह देश के गई गाँवों में आज भी होता है, जनजाति क्षेत्र के गाँवों भी।
वैसे भी जग चाहे कितना भी
भौतिक हो जाए, परन्तु भारतीय समाज में धर्म का स्थान विशेष होने के कारण
भगवान की पूजा सर्वत्र देखने को मिलती है। केवल कम पढ़े-लिखें ही नहीं परन्तु
विज्ञान के किसी विषय में संशोधन करने वाले युवक भी हनुमान को अपना भगवान
मानते हैं।
हम आज यहाँ हनुमान
को भगवान के रूप में नहीं परन्तु एक आदर्श सेवक के रूप में देखेंगे। सार्वजनिक
जीवन में सेवा कार्य में कार्यरत हम सबके वे मार्गदर्शक है। राम कार्य के बीना, जिनका मन किसी दूसरे काम में नहीं
लगता, उतना एकाग्र चित्त यदि हमारा अपने कार्य में रहे, तो सफलता के प्रति साशंक होने का कोई कारण ही नहीं।
मनोजवं मारूत तुल्य वेग
जितेन्द्रियम् बुद्धिमताम् वरिष्ठम् ।
वातातमजम् वा नरयुत मुख्यम्
श्रीराम दूतम् शरणम् प्रपद्येत ।।
हनुमान बुद्धिमानी
का उत्तम उदाहरण है। कार्य करना और वह भी पूर्ण मनोयोग के साथ, बुद्धि का प्रयोग करते हुए। उन्हें
‘बुद्धिमत्ताम् वरिष्ठाम’, कहा है। अपने रूप को कब छोटा करना और कब विशाल रूप धारण
करना - वे बराबर जानते थे। रावण जैसे महाप्रतापी के सामने जाने से पहले, क्या क्या पराक्रम दिखाना - वे
बराबर जानते थे। स्वयं शक्तिशाली है और शक्ति का प्रयोग बुद्धि के साथ कर, अपनी भूमिका निभानेवाले हनुमान, हम सबके लिये
कार्यकर्ता के रूप में एक उत्तम उदाहरण है।
मन में विश्वास न
हो तो प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा लगता है कि ‘मैं ये काम नहीं कर सकूंगा’। परन्तु हनुमान का स्मरण इसलिये
करना कि कठिन से कठिन कार्य भी ‘मैं कर सकता हूँ’, का विश्वास वे जगाते है। आत्मविश्वास का दूसरा नाम है
हनुमान।
हनुमानजी के स्वयं
के जीवन में भी एक प्रसंग है, एक बार वे अपनी शक्ति को भूल गए। साथियों ने उन्हें स्मरण
कराया, विश्वास दिलाया तो सीता माता की खोज़ हेतु सम्पूर्ण सागर पार
कर गए। सागर के एक छोर से दूसरे छोर तक कूद लगाना इसे हम रूपक कहेंगे, तो भी कठिनतम
कार्य करने का विश्वास दिलानेवाला यह कार्य है, इसमें कोई दो राय
नहीं।
युद्ध के समय
लक्ष्मण जी मुर्छित हो गए। उस संकट के समय, विशालतम पहाड़ उठाकर ले आना भी तो एक कठिनतम कार्य ही था, जो
हनुमानजी ने किया था। नित्य के जीवन में हम भी कई संकट की घड़ियों का सामना करते
होगें ऐसे समय हनुमान का स्मरण मात्र पर्याप्त है। वह कार्य सिद्धि
कराता है।
जहाँ जहाँ
बलोपासना होती है, अखाड़ों में दंगल होती है, वहाँ हनुमान की जय
बोली जाती है। आप भी एक बार अनुभव करके देखों, समूह में सभी एक
साथ हनुमानजी की जय बोलो, साधरण से युवक में भी शक्ति का संचार होगा। अशक्य लगने वाला
कार्य वह एक चुटकी में कर देगा। यही भगवत स्मरण का चमत्कार है। आजकल जिम में
जानेवाले ये सब भूल गए है, अन्यथा व्यायामशाला की तो आत्मा ही हनुमान है।
कार्य करनेवाले
किसी भी कार्यकर्ता के लिये कार्यशरणता सदा ही आवश्यक है। कार्यशरणता का एक अच्छा
उदाहरण है हमारे हनुमान। कार्य करते समय मन यदि भटक गया, कहीं इधर-उधर हो
गया तो कार्य सफल नहीं होता। इसलिये एक काम हाथ में लिया, तो पूर्ण शक्ति
लगाकर, एक चित्त होकर करते रहना आवश्यक है। हनुमान ने रामकार्य
करते समय यही किया। वे रामकार्य के साथ सम्पूर्ण शरण थे। मन में कोई दूविधा नहीं, कोई शंका नहीं।
मेरे राम, उसका काम, बस ! एक ही धुन थी। दूसरा कुछ नहीं। मोती की माला में यदि ‘राम’ न दिखाई दे तो उसका कोई मुल्य नहीं।
हनुमान के
व्यक्तित्व की एक और विशेषता है कि उन्होंने वानरसेना का नेतृत्व करते हुए रावण से
युद्ध किया। कार्य करते समय संगठनकुशलता भी महत्वपूर्ण है। हमें भी समाज के
विभिन्न समूहों से आए कार्यकर्ताओं के साथ कार्य करना है, तो संगठनकुशलता से काम लेना होगा। प्रत्येक व्यक्ति में जो
गुण है उसे आधर बनाकर, उसको अवसर देना और सभी को कार्य के साथ जोड़ते रहना। यदि
किसी में कोई कमी है तो सार्वजनिक रूप में न तो कहना, नाही बड़ी करना। उचित समय पर व्यक्तिगत रूप में कहना ही
पर्याप्त है। हनुमान जी के साथ जितने वानर थे सभी तत्कालिन समाज के सामान्य स्तर
से ही तो आए थे। उनमें भी कई प्रकार की विविधता होगी। वानर मात्र में कुछ गुण
होंगे, कुछ अवगुण। सभी को एकत्रित कर, उनका सैन्य खड़ा कर
उनकी की शक्ति के बल पर ही तो रावण को परास्त किया था।
नल, नील जैसे अभियन्ताओं की योजना से भारत से लंका तक का विशाल सेतु बना। असम्भव लगने वाला कार्य संगठित शक्ति एवं अभियांत्रिक कुशलता के कारण सम्भव हुआ। विशालकाय पत्थरों को उठाकर लाना और सेतु का निर्माण करना यह केाई यंत्र के कारण नहीं परन्तु मानवी शक्ति के बल पर ही तो किया था। धन्य है उस हनुमान की जिन्होंने सामान्य से वानरों की असामान्य शक्ति को जगाकर सेतु का निर्माण कराया।
नल, नील जैसे अभियन्ताओं की योजना से भारत से लंका तक का विशाल सेतु बना। असम्भव लगने वाला कार्य संगठित शक्ति एवं अभियांत्रिक कुशलता के कारण सम्भव हुआ। विशालकाय पत्थरों को उठाकर लाना और सेतु का निर्माण करना यह केाई यंत्र के कारण नहीं परन्तु मानवी शक्ति के बल पर ही तो किया था। धन्य है उस हनुमान की जिन्होंने सामान्य से वानरों की असामान्य शक्ति को जगाकर सेतु का निर्माण कराया।
‘मेरे शब्दकोष में असम्भव सा शब्द ही नहीं है’, There is no word 'Impossible' in my dictionary. एसा पढ़ाई के दौरान किसी नेपोलियन जैसे महानुभाव के सन्दर्भ में सुना था। मन में विचार आता है की जिस देश के पास हनुमान जैसा व्यक्तित्व है उसे अन्य कोई उदाहरण ढूंढने की कोई आवश्यकता ही क्यों रहे !
जिसके पास शक्ति
होती है वह विनयशील होते ही है एसा नहीं। परन्तु रामायण की कथा सुनते समय हनुमान
जैसे शक्तिशाली वीर के संवाद हम सुनेंगे तो आश्चर्य होता है। कितना विनयशील थे वे
! अपनी शक्ति के कारण आत्मविश्वास था परन्तु कहीं पर भी लेश मात्र दूराभिमान देखने
को नहीं मिलता। एक कार्यकर्ता के नाते आवश्यक गुणों में से ये एक गुण है। जो हनुमान
के व्यक्तित्व में हम देखते है।
किसीने हनुमान जी
के व्यक्तित्व पर एक एनिमेशन फिल्म बनाई और आप सब जानते ही है की बाल मानस पर वो
कैसे छा गई ! छोटे तो क्या बड़े भी यदि उस फिल्म के दर्शक बनते है तो घण्टों तक
देखते ही रह जाते है।
किसी एकल विद्यालय
के आचार्य ने यदि वनवासी बालक-बालिकाओं को केवल सप्ताह में एक दिन हनुमान जी के
जीवन पर आधारित कथा कहना प्रारम्भ किया तो कई महिनों तो वह बाल मन को जीत सकता है।
एक कार्यकर्ता के नाते हम भी इस व्यक्तित्व का अध्ययन करेंगे तो कल्याण आश्रम जैसे
ईश्वरीय कार्य के लिये आवश्यक सब गुणों को हमारे व्यक्तित्व में विकसित होते देख
सकेंगे।
इसलिए पुनः एक बार
कहने का मन करता है की हनुमान भगवान तो है ही उससे भी अधिक वे भक्त है, सेवक है। हमें
उनकी पूजा करने के साथ साथ आदर्श के रूप में उनका स्मरण करना चाहिए, अनुगामी बनना चाहिए।




बहुत ज्ञानवर्धक लेख है।
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