संस्कृति और आस्था अविभाज्य है
- आनंद, दिल्ली
जनजाति समाज की कई समस्याएँ है जैसे सामूहिक वनाधिकार, विस्थापन और पुर्नवास, भूमि अधिग्रहण ईत्यादी। जनजाति समाज का नेतृत्व करने वाले कुछ व्यक्तियों के साथ जब चर्चा सत्र का आयोजन हुआ तो एक और समस्या ध्यान में आई। वह है दोहरा लाभ लेने की समस्या। चर्चा में सम्मिलित सभी का एक मत था कि जनजाति समाज जीवन को प्रभावित करने वाली इस समस्या पर हमने काम करना चाहिए। चर्चा के अंत में एक स्वतंत्र मंच बनाने पर भी विचार हुआ। ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ इस नाम से मंच गठित हुआ। मंच के साथ देश भर के कई व्यक्ति जुड़ते गए।
जनजाति समाज की परम्पराएं, रीति-रिवाज, आस्था को छोडकर जब एक व्यक्ति अन्य धर्म (जैसे इसाई अथवा मुस्लिम) में चला जाता है, तो उसे अन्य धर्मावलम्बि कहना चाहिए। उसे जनजाति अथवा आदिवासी कहना उचित नहीं होगा। जैसे अनुसूचित जाति का व्यक्ति अन्य धर्म में चलें जाने से उसकी अनुसूचित जाति की पहचान नहीं रहती। वैसे ही जनजाति समाज के बारे में होना चाहिए। बहुत वर्षों पूर्व इस सन्दर्भ में संविधान सभा में चर्चा चलीं थी। परन्तु उस पर कोई निर्णय नहीं हो सका।
लोकसभा सांसद स्व. कार्तिक उरांव जी ने यह प्रश्न 1967 में उठाया था। इस हेतु 1970 तक तत्कालीन 348 सांसदों से सम्पर्क कर उनकी सहमति भी प्राप्त की। संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का गठन हुआ परन्तु विषय अधूरा ही रहा।

इसी सन्दर्भ में मंच ने 2009 में छोटे-बडे़ नगरों से लेकर सुदूर जनजाति गाँवों में सम्पर्क कर 28 लाख हस्ताक्षर एकत्र किए। वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्व. जगदेव राम उरांव, जनजाति सुरक्षा मंच के पूर्व राष्ट्रीय संयोजक हर्ष चैहान, जनजाति नेता स्व. दिलीप सिंह भुरीया, सुश्री अनुसूया उईके, तत्कालीन जनजाति हितरक्षा प्रमुख विष्णुकान्त जैसे अन्य कई महानुभावों ने 18, जनवरी-2010 में राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल को संग्रहित हस्ताक्षर सौंपे और एक ज्ञापन भी दिया।
संक्षेप में कहे तो पिछले कुछ समय से इस विषय के बारे में सतत संधर्ष चल ही रहा है। आशा है कि भविष्य में सुखद परिणाम देखने को मिलेंगे। जैसा इस विषय का सांस्कृतिक एवं सामाजिक पक्ष है वैसा एक कानूनी पक्ष भी है। उस पर भी विचार होना चाहिए।
देश में 2011 की जनगणना अनुसार 8.6 प्रतिशत अर्थात 104,545,716 जनजाति समाज की जनसंख्या है। 2021 में पुनः जनगणना होना अपेक्षित था, परन्तु कोरोना महामारी जैसी स्थिति में वह सम्भव नहीं हो सका। हम ऐसा अनुमान करें की इसमें अंदाजित कुछ 20 प्रतिशत वृद्धि हुई होगी, तो 12.5 करोड़ जनसंख्या मान सकते है। भारत में जनजाति समाज पाँचवीं तथा छठवीं अनुसूची के क्षेत्र और कुछ अन्य राज्यों में निवास करता है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब जैसे राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश चंदिगढ़ में जनजाति लोकसंख्या नहीं है।
संविधान ने अनुसूचित जाति की तरह अनुसूचित जनजाति को भी आरक्षण (7.5 प्रतिशत) दिया है। सरकारी सेवा में तथा केन्द्र तथा राज्यों में निर्वाचित प्रतिनिधियों के सन्दर्भ में यह आरक्षण उपलब्ध है। 1950 से राष्ट्रपति के आदेश द्वारा अनुसूचित जाति हेतु अनुच्छेद 341 में तथा अनुसूचित जनजाति हेतु अनुच्छेद 342 में अधिसूचित किया गया है। इसी प्रकार ओबिसी और ईबिसी हेतु भी प्रावधान है।
जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय संयोजक गणेश राम भगत ने जशपुर (छ.ग.) में सभा को संबोधित किया।
क्या है यह अनुच्छेद 342 ?
इसके अंतर्गत राष्ट्रपति, सम्बन्धित राज्यपाल महोदय से परामर्श कर, सार्वजनिक सूचना द्वारा किसी जनसमूह को अनुसूचित करते है। वैसे ही किसी नए जनसमूह को जनजाति के रूप में अनुसूचित करना अथवा किसी जनसमूह को अनुसूचि से हटाने का निर्णय भी कर सकते है। भारत की संसद को भी इस प्रकार सूचि में शामिल करने अथवा हटाने का अधिकार है।
इसी लेख में हमने प्रारम्भ में उल्लेख किया है कि कोई व्यक्ति जो अनुसूचित जाति का है, धर्म बदलते ही वह अनूसूचि में नहीं रहता। परन्तु अनुसूचित जनजाति के लिए वैसा नहीं है। यदि जनजाति समाज में कोई व्यक्ति धर्म बदलता है, तो उसे भी अनुसूचित जनजाति की सूचि से हटाना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहना हो तो धर्मान्तरित व्यक्ति अनुसूचित जनजाति की पहचान नहीं खोता और धर्मान्तरित व्यक्ति दोहरा लाभ लेता है।
ये कैसे सम्भव है ? इसके बारे में सरल शब्दों में कहे तो धर्मान्तरित व्यक्ति लाभ लेने हेतु कभी अल्पसंख्यक की खिड़की के सामने खडे़ होता है और अगले ही पल एस.टी. की खिड़की के आगे भी खड़ा होता है। लाभ दोनों प्रकार से उठाता है। एक ही व्यक्ति ने एस.टी. के नाम पर चुनाव लढ़ा और विधानसभा सदस्य भी रहा। वही व्यक्ति राज्य के अल्पसंख्यक आयोग का सदस्य भी रहा। है न, ये दोहरा लाभ।
वास्तव में संविधान ने संस्कृति, रीति-रिवाजों, परम्पराओं की पहचान को सुरक्षित रखते हुए विकास हेतु अनुसूचित करते हुए जनजाति समाज को आरक्षण दिया है परन्तु वही आरक्षण धर्मान्तरित व्यक्ति को संस्कृति, परम्परा की पहचान बदलने के बाद भी मिलते रहता है। वास्तव में यही अन्याय है। किसी व्यक्ति ने कौन से धर्म का पालन करना, यह उसका व्यक्तिगत निर्णय है। इसलिए धर्मान्तरित क्यों हुआ ? यह अभी चर्चा का विषय नहीं है। परन्तु जब वह जनजाति समाज की संस्कृति, परम्परा, उसके पूर्वजों को नहीं मानता तो उसे जनजाति के रूप में लाभ क्यों मिलना चाहिए? फिर भी यदि उसे वह लाभ मिल रहा हो, तो जिसे मिलना चाहिए उसका हिस्सा अपने आप कम हो जाता है। विकास के मार्ग में यह एक अवरोध ही मानना चाहिए।
क्या यह समस्या अभी-अभी सामने आई है ? तो हमें यह जानने की आवश्यकता है कि पहले कभी संसद में इसके लिए चर्चा भी हुई है। संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का गठन भी हुआ था। संसद में 342 के राष्ट्रपति आदेश में संशोधन हेतु विधेयक प्रस्तुत किया, तो वह जेपीसी को भेजा गया। वहां भी विस्तृत विचार हुआ। जब मतदान की बारी आई तो 33 में से 32 सदस्यों ने इसके पक्ष में और एक सदस्य ने विरूद्ध में मत दिया। अर्थात एक को छोड़ कर सभी की सहमति थी।
एक महत्वपूर्ण बात यानि स्व. कार्तिक उरांव ने इसके सन्दर्भ में लोकसभा एवं राज्यसभा के 348 सांसदों के हस्ताक्षर एकत्रित कर प्रधानमंत्री को ज्ञापन दिया। उन्होंने अपनी ओर से पूरजोर प्रयास किए। परन्तु तत्कालीन प्रधानमंत्री ने केवल आश्वासन देकर विधेयक को अर्थात इस विषय को टाल दिया। तबसे कई वर्षों तक यह ठण्डे बस्ते मंे रहा।
व्यक्ति की दोनों प्रकार की पहचान एक समस्या है और पहले कभी इसके सन्दर्भ में कोर्ट में भी केस दाखिल हुआ था, तो कोर्ट ने भी जनजाति समाज के हित में निर्णय दिया था। किसी भी जागरूक व्यक्ति ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय और केरल उच्च न्यायालय के निर्णय का अध्ययन करना चािहए, तो विषय और भी स्पष्ट हो जाएगा। जनजाति समाज के पढ़े-लिखें व्यक्ति, जनजाति समाज की सेवा में कार्यरत विभिन्न संस्थाओं के कार्यकर्ता भी इसके बारे में थोड़ा अध्ययन कर विषय को ठीक तरह से समझेंगे, तो समाज को बहुत लाभ होगा। समाज में सही विमर्श खड़ा होने की भी आवश्यकता है और इस हेतु सज्जनशक्ति का सक्रिय होना बहुत आवश्यक है।
जनजाति सुरक्षा मंच ने जनजाति समाज पर हो रहे इस अन्याय के सन्दर्भ में प्रयास करना प्रारम्भ किया तो पहले हस्ताक्षर संग्रह, फिर राष्ट्रपति से सम्पर्क जैसे प्रयास किए। अभी-अभी मार्च-2022 में फिर से वर्तमान लोकसभा एवं राज्यसभा के 445 सांसदों के सम्पर्क का कार्यक्रम हुआ। इस हेतु देश भर से कार्यकर्ता दिल्ली आए और दलीय राजनीति से उपर उठकर सभी सांसदों से मिले। सांसदों को इस हेतु कुछ साहित्य भी दिया। सम्पर्क के दौरान कार्यकर्ताओं ने सांसदों को सुझाव दिया कि आप इस विषय को विभिन्न सार्वजनिक मंच से उठाईए, समाज में भी इस हेतु चर्चा होनी चाहिए, जैसी बात कही गई। विषय को गंभीरता से सुनते हुए अधिकांश सांसदों ने सकारात्मक अभिमत दिया। जैसे सांसदों का सम्पर्क है वैसे ही देश के जनजाति क्षेत्र में एक छोटे से गाँव के सरपंच से लेकर नगर, तहसिल, जिला पंचायत, विधानसभा सदस्य जैसे जनप्रतिनिधियों का भी संपर्क हो रहा है। कानून के जानकार, सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्ति एवं जनजाति क्षेत्र में समाज सम्पर्क भी हुआ है। हम आपके साथ है, इस बारे में एक स्वतंत्र आयोग का गठन कर इस महत्वपूर्ण विषय को आगे ले जाना चाहिए जैसे कई सुझाव भी मिले है।
अब अगले चरण में देश के 200 से अधिक जनजाति जिलाओं मे रैली की योजना बनी है। समाज जागरण और संसद में इसके बारे में निर्णय हेतु प्रयास चल रहे है। समय-समय पर देश की संसद ने कई कठिन समस्याओं के सन्दर्भ में निर्णय किए है। इसके बारे में भी संसद निर्णय कर सकती है। परन्तु लोकतंत्र में शक्ति की बात मानी जाती है। जनजाति समाज ने भी संगठित होकर एक आव़ाज में कहने की आवश्यकता है।
मन में एक विचार आता है कि क्या यह समस्या केवल जनजाति समाज की है, या सम्पूर्ण देश की है ? समस्या के समाधान हेतु गैर जनजाति समाज की इसमें क्या भूमिका होनी चाहिए ? तो एक बात समझने की आवश्यकता है कि इस वैचारिक युद्ध में समाज विघातक तत्वों का सामना करने गैर-जनजाति समाज ने भी मुखर होना चाहिए। जब हम कहते है कि सभी की नसों में एक ही रक्त बहता है तो सभी भारतवासियों ने सम्पूर्ण शक्ति के साथ जुड़ जाना चाहिए। यह हमारा कर्तव्य है। जनजाति समाज को भी ‘हम सब एक है’ कि अनुभूति होगी।
भारतीय संस्कृति में देवों की पूजा, अर्चना का विशेष महत्व है। जीवन के सोलह संस्कारों से लेकर सभी परम्पराओं में हम देव पूजा करते है। यह अपनी आध्यात्मिकता का परिचायक है। अनुभव के आधार पर हम विश्वास के साथ कह सकते है कि संस्कृति का सीधा सम्बन्ध आस्था, श्रद्धा अथवा विश्वास के साथ है। उसे चतुराईपूर्वक अलग मानते हुए, चर्चा में लाने और दोनों भिन्न है ऐसा विमर्श खड़ा करने का प्रयास किया गया है। इसमें समाज विघातक शक्तियाँ कार्यरत है। केवल जनजाति समाज को नहीं अपितु सभी भारतवासियों को इस भ्रमजाल में फसाने के प्रयास होते दिखाई देता है। हमने सजग होकर यह स्पष्ट रूप में कहना चाहिए कि संस्कृति और आस्था अविभाज्य है।
लेखक जनजाति क्षेत्र में कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता है।



Comments
Post a Comment