पलायन रुका, खेत लहलहाए
- चेतरात पवार
महाराष्ट्र के धुले जिले
के अत्यंत पिछड़े व साधनहीन गाँव बारीपाड़ा में जन्म, तंगहाली के बीच एम.कॉम. तक पढ़ाई की । नौकरी मिल रही थी, परन्तु ठान लिया कि नौकरी करने बाहर नहीं जाना है। गाँव वालों को साथ लेकर गाँव में
खुशहाली लानी है। खेतों, जंगलों को हरा-भरा बनाना
है। कुओं और तालाबों को पानी से सराबोर करना है।
गाँव के लोगों को जल, जंगल, जमीन, जानवर और जन का महत्व बताया। वन संरक्षण समिति गठित कर के
शुरुआत जंगल बचाने से की।
चेतराम के निर्देशन और
वनवासी कल्याण आश्रम के सहयोग से न्यूनतम लागत से अधिकतम पैदावार हासिल करने की
मुहिम रंग लाने लगी। वर्ष भर में दो फसलों की पैदावार लाई खेतों में जान और लोगों
के घर खुशहाली।
देश-विदेश में अनेक
पुरस्कारों से सम्मानित संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने विशेष सम्मान अर्पित
किया।
⇓ मुम्बई में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में
चैतराम जी की बात सुन कर
फिल्म कलाकार अक्षय कुमार भी अचंबित हो गए।
नहीं हूँ।
मैंने लोगों के साथ काम करके जो कुछ सीखा है वहीं आपको बताता हूँ। छोटा सा गाँव है
बारीपाडा, जहाँ तीस साल पहले बहुत
सारी समस्याएँ थीं जंगल कटता जा रहा था, खेती नहीं होती थी। मैंने
सोचा एक तरफ तो हम 21वीं शताब्दी की और जा रहे
हैं और अपने गाँव को साथ लेकर न चले तो ठीक नहीं होगा तभी वनवासी कल्याण आश्रम से
परिचय हुआ। शिक्षा, स्वास्थ्य तथा खेती
संबंधित समस्याओं का गाँव में हमेशा ही बोलबाला रहता है जिसके कारण गाँव के लोगों
का पलायन एक गहन चिंतन का विषय बन चुका था।
इसको ध्यान में
रखते हुए लोगों की सभी समस्याओं से लड़ने के लिए वनवासी कल्याण आश्रम ने कई प्रकार
की मुहिम शुरू की है। हमने सोचा कि अपनी तरफ से हम जो कुछ कर सकते हैं वह करेंगे
गाँव मैं जंगल कट रहा था 15-20 गाँवों के लोग आकर पेड़ों की कटाई करते थे जिसको रोकना
था। हम समझ गए थे कि अगर जंगल नहीं रहेगा तो पानी भी नहीं रहेगा। जंगल-पानी दोनों नहीं
रहेंगे तो लोग कैसे रहेंगे इसलिए पहले जंगल बचाना था। हमने कुछ नियम बनाए कि कोई
जंगल काटने ना जाए। पेड़ों की कटाई पर जुर्माना लगाया। ग्राम सभा में नियमावली
बनाकर वन संवर्धन किया जिससे जल संरक्षण में वृद्धि हुई है तथा जंगली जानवरों को
संरंक्षित किया गया है।
जब जंगल बचाना
संभव हो गया तो हमने सोचा कि पानी की भारी कमी है इसके लिए भी कुछ करना चाहिए
लेकिन जैसे-जैसे जंगल बढ़ने लगा हमने देखा कि भूजल के स्तर में भी बढ़ोतरी हो गई।
हमने सोचा कि सरकार जो करेगी वह करेगी लेकिन हम गाँव के लोगों को भी कुछ करना
चाहिए। हमने गाँव के लोगों को साथ लेकर करीब 480 छोटे-छोटे बांध बनाए
जिससे मिट्टी का कटाव रुक गया। इसके अलावा जो पानी बह जाता था उसको भी इन छोटे
बांधों से रोकने में मदद मिली ग्राम वासियों ने आर्थिक सहयोग जुटाकर गांव में 5000 से अधिक पेड़ पौधे लगाए। पेड़ पौधों की सहायता से मिट्टी का
कटाव रोका गया जिससे भूमिगत जल स्तर को बढ़ाने में सहायता मिली है। कृषि विकास के
लिए धान, गेहूं, आलू और प्याज ऐसी फसलों का सफल प्रयोग शुरू किया। सौर ऊर्जा
पर आधारित पंपसेट तथा सामूहिक वनाधिकार प्राप्त किए।
जल, जंगल, जमीन, जानवर पर आधारित विकास पर गौर किए जाने की आवश्यकता है। यदि
हमें पर्यावरण को बचाना है तो जल, जंगल, जमीन, जानवर का संरक्षण करना
अति आवश्यक है।
साभर : पांचजन्य साप्ताहिक (दिल्ली)
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