प्रथम मासिक स्मृतिदिन निमित्त सादर नमन
एक उत्तम
मनोविश्लेषक - बालासाहब दीक्षित
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बालासाहब कहते थे-कल्याण आश्रम का कार्य ईश्वरी कार्य है, अतः अपना कार्य ‘अध्यात्मिक कार्य’ है।
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बालासाहब कहते ही
कार्यकर्ताओं को कल्याण आश्रम के स्थापक का स्मरण होना स्वाभाविक है। बालासाहब
देशपाण्डे और बालासाहब दीक्षित दोनों एक ही पथ पर चलने वाले पथिक। दोनों का आदर्श
डा. हेडगेवार। दोनों का जीवन एक समान, अर्थात अनेकों के लिए प्रेरक। अंतर केवल इतना कि एक थे
विवाहित तो दूसरे संघ प्रचारक। आज हम यहाँ बालासाहब दीक्षित की बात करेंगे। जिनकी इस जगत की विदाय से केवल एक मास हुआ है।
नाशिक से रात 03 बजकर 10 मिनट को संदेश मिला कि बालासाहब दीक्षित शांत हो गये। हम
सब जानते है कि ‘जिसका जन्म हुआ
है उसकी मृत्यु अटल है’ परन्तु कुछ
व्यक्तित्व एसे होते है कि इस जगत से विदा होने पर भी प्रेरणा के रूप में सबके बीच
में ही रहते है।
मृत्यु के समय
आपकी आयु 93 वर्ष की थी। मेरी जितनी
आयु है उससे अधिक तो बालासाहब का प्रचारक जीवन रहा, 70 वर्ष से अधिक। संघ प्रचारक के रूप में
महाराष्ट्र के धाराशीव जिला में आपने वर्षों तक काम किया। न पक्की सड़कें, न आवागमन की
सुविधा - ऐसे समय में घण्टों तक चलकर एक गाँव से दूसरे गाँव प्रवास
कर संघ कार्य किया। अनेक कार्यकर्ताओं को संघकार्य में कार्यरत किया। पुरूषार्थ से
100 से अधिक शाखाएँ प्रारम्भ
की। संघ कार्य में वास्तव में पसीना बहाया।
आपके व्यक्तित्व
में एक चुंबकीय गुण था। अनेक कार्यकर्ता उन्हें मिलने स्वयं चले आते। उस समय
कार्यालय में कार्यकर्ताओं का जमावडा रहता था। कार्यकर्ता कार्यालय पर मिलने आते
तो बालासाहब बडे़ धैर्यपूर्वक उन्हें सुनते थे। कार्यकर्ता कहते कि वे एक उत्तम
मनोविश्लेषक थे।
हम जानते है कि
संघ का काम मनुष्य निर्माण का काम है। बालसाहब ने इस कार्य को जीवन के अंतीम क्षण
तक किया। उनकी व्यक्ति परख अद्वितीय थी। आईये ! कुछ उदाहरण देखे।
एक किराने की दूकान
में नौकर के रूप में काम करने वाले युवक का परिचय हुआ। उसकी स्नेहपूर्वक पूछताछ
की। उसे दूसरी जगह काम दिलाया, जहाँ काम करते
करते पढ़ाई भी हो सके। वह युवक पढ़-लिख कर नौकरी में भी आगे बढ़ा और संघ कार्य में
भी। भविष्य में वह संघचालक बने।
एक शिक्षक ने बड़े
गौरव से कहा कि मेरा विद्यार्थी 10वीं में प्रथम
आया है। बालासाहब उसे स्वयं मिलने गए। उसका अभिनंदन किया। आत्मीय सम्बन्ध का
परिणाम एसा कि वह बालक आगे चलकर एम.डी. (डाक्टर) हुआ। केवल इतना ही नहीं तो जब
चेन्नई गया तो उसे वहाँ रहने की सुविधा हेतु सहयोग भी किया। निरेपक्ष भाव से
व्यक्ति के साथ सम्बन्ध बनाना यह तो कोई बालसाहब से ही सीखे। एसे एक नहीं कई
उदाहरण है।
कभी-कभी
कार्यकर्ता से दुगनी आयु परन्तु साथ रहते समय किसी को भी आयु का अंतर कभी अनुभव
नहीं हुआ। सम्बन्ध इतना प्रेमपूर्वक रहता कि व्यक्ति का मन सहज रूप में आकर्षित होता
था। सभी ने अपने व्यक्तिगत जीवन में आगे बढ़ना चाहिए और समाज जीवन के लिए काम करना
चाहिए, ये दो बातें अपने व्यवहार
से उन्होंने सिखाई।
डाक्टर हेडगेवार
सम्पूर्ण हिन्दू समाज के लिए द्रष्टा थे। उनके चरित्र में पढ़ा है कि साथ रहने वाले
सभी को एसा लगता-डाक्टर मुझसे केवल एक-दो कदम दूरी पर है। थोडा प्रयास करने पर मैं
उनके साथ अवश्य चल सकता हूँ। डाक्टर सदैव आगे रहे, कार्यकर्ताओं की अखण्ड प्रेरणा बनी रही। ऐसा ही कुछ
बालासाहब दीक्षित के बारे में अनुभव में आया। किसी ने व्यक्त किया, किसी ने नहीं, परन्तु जो सम्पर्क में आया सभी को इसकी अनुभूती अवश्य हुई।
आपातकाल के
पश्चात संघ के महाराष्ट्र प्रांत संघचालक माननीय बाबाराव भिडे ने एक दिन बालासाहब
को बुलाया और ‘वनवासी कल्याण
आश्रम का कार्य प्रांत में खड़ा करना है’ का प्रस्ताव रखा। उन्हें वनवासी कल्याण आश्रम के प्रांत संगठन मंत्री का
दायित्व दिया। एक नए पर्व का प्रारम्भ हुआ।
वनवासी कल्याण
आश्रम के संस्थागत सभी कार्य सम्पन्न करना और सुदूर वन-पर्वतों में विभिन्न प्रकार
के सेवा प्रकल्पों को प्रारम्भ करना, बालासाहब ने यह सारा काम बड़ी कुशलता के साथ किया। इस कार्य के लिये कार्यकर्ताओं
का समूह बनाया। सभी जिलों में कार्य स्वयंपूर्ण हो ऐसी समितियों की रचना की।
जनजाति कार्यकर्ता भी अपने कार्य में कार्यरत होने चाहिए का बराबर ध्यान रखा। उनकी
कार्यशैली को देखें तो ऐसा लगता है मानो मनुष्यनिर्मिती का एक सचल विद्यालय
अहर्निष कार्य कर रहा हो।
आज हम कल्याण
आश्रम के देश भर के कार्य में कई आयाम देख रहे है। उसमें से कई आयामों के काम का
प्रारम्भ कई वर्षों पूर्व महाराष्ट्र में बालासाहब ने कार्यकर्ताओं के प्रयासों से
किया था। प्रयोगशीलता की कोई कमी नहीं।
अनेक गाँवों में
जाना, वनवासी के घर-घर जाना और
अपने स्नेह से सबको जोड़ना। कार्य आगे बढते गया। एक वनवासी बालक 12वी की परीक्षा में अनुर्तीण हुआ। परन्तु उसे
पुनः पढ़ने के लिए बालासाहब ने कहा, उसका उत्साहवर्धन
किया। उसे सभी का प्रकार की सहायता की और आगे चल कर वह वनवासी बालक न केवल स्नातक
अपितु पीएचडी हुआ। एक जनजाति बालक अपने स्वयं के कठोर परिश्रम से डाक्टर बना,
प्राध्यापक बना। उसने बालासाहब दीक्षित को
श्रद्धांजलि देते समय कहा कि ‘आज मैं जो कुछ भी
हूँ बालासाहब के कारण हूँ।’
कल्याण आश्रम के
छात्रावास में रसोई करने आई एक कातकरी जनजाति की महिला को उसका काम करने के
साथ-साथ उसे कल्याण आश्रम समझाया। ‘अपने वनवासी
बान्धवों के लिए हमें काम करना चाहिए’ की प्रेरणा दी और वह महिला पहले तहसिल, फिर जिला एसा क्रमशः दायित्व लेते लेते आज कोकण प्रांत की
अध्यक्षा बनी। उसने विवाह के पूर्व विद्यालय नहीं देखा था। निरक्षर को साक्षर बनाना
चाहिए के भाषण हमने कई बार सुने होंगे परन्तु बालासाहब ने इस वनवासी महिला को
अक्षरज्ञान मिले एसी व्यवस्था की। उसका कंठ बहुत ही मधुर था। परम्परागत रूप में
भजन गाने का अभ्यास था। उसे संगीत की शिक्षा मिले इस हेतु पास के बडे़ गाँव के एक
संगीत शिक्षक को छात्रावास भेजने का क्रम बनाया।
नागपुर जैसे बडे़
शहर की एक शिक्षा संस्था के वार्षिक उत्सव में इसी महिला ने अपना मनेागत व्यक्त
करते हुए कहा कि सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जब निराशा का अनुभव हुआ तो हमारे
सामने बालासाहब दीक्षित जैसा आदर्श था। बालासाहब यदि दूसरों के लिए दिन-रात
परिश्रम कर रहे है तो हमें भी कार्य करना चाहिए-ऐसा उसका कहना था। तब श्रोताओं को
बालासाहब जैसे व्यक्तित्व की ऊँचाई का परिचय हुआ।
इस व्यक्तित्व का
एक विलोभनीय पहलु यानी बालासाहब का मिलना हुआ और पढ़ने के लिए पुस्तक न मिली एसा
व्यक्ति सम्भवतः कोई नहीं। सभी को पुस्तक देना, पढ़ने का आग्रह करना, कुछ समय पश्चात क्या पढ़ा कि पूछताछ करना यह उनका स्वभाव था।
मानो, वे पुस्तक के माध्यम से
व्यक्ति को आत्मावलोकन का अवसर देते थे।
मैं जब कल्याण
आश्रम में कार्यरत हुआ तो एक बार गुजरात से नाशिक आया था। कार्यालय में बालासाहब
जी से मिलना हुआ। उनके कक्ष में मैंने भी बहुत पुस्तकें देखीं। उन्होंने मुझे ‘तत्वमसी’ यह गुजराती पुस्तक दी और कहा इस गुजराती पुस्तक का मराठी
में भी अनुवाद हुआ है। उन्होंने दोनों पढ़ने का आग्रह किया।
बालसाहब ने
जिन्हें पुस्तक दिया न केवल वे मित्र बनते परन्तु कई पुस्तक प्रकाशक भी उनके मित्र
थे। कार्यालय पर मिलने आने पर वे उनसे परामर्श करते। नवीन पुस्तक प्रकाशित होने पर
वह बालासाहब के पास अवश्य देखने को मिलती। बालासाहब स्वयं पाठक थे, वितरक थे, प्रोत्साहक थे, समीक्षक थे और पाठकों से लेकर प्रकाशकों तक सबके मित्र भी थे।
महाराष्ट्र
प्रांत संगठन मंत्री के पश्चात पश्चिम क्षेत्र संगठन मंत्री, अखिल भारतीय छात्रावास प्रमुख, पूर्णकालीन कार्यकर्ता प्रमुख के रूप में आपने
कई वर्षों तक कार्य किया। गोरखपुर में जब अखिल भारतीय छात्रावास प्रमुखों का वर्ग
हुआ था तो कार्यकर्ताओं ने बालासाहब में समयबद्धता, अनुशासन आग्रही, गुणग्राही संगठक जैसे अनेक गुण देखें। साथी कार्यकर्ताओं को उन्होंने कभी
आज्ञा के स्वर में काम नहीं कहा, प्रत्येक बार
उनका कहना एक सुझाव के रूप में था और काम कुशलतापूर्वक पूर्ण होता था।
समय के साथ आयु
बढ़ते गई। थकान देखने को मिल रही थी परन्तु एसे में भी अण्डमान जैसे कठिन स्थान पर
आपने प्रवास किया। मन में कार्य के प्रति दृढ निश्चय है तो कोई भी काम आसान ही
होता है।
आयु एवं
स्वास्थ्य के चलते उन्हें जब नाशिक कार्यालय में रहना तय हुआ तो प्रवास नहीं के
बराबर था। वास्तव में उनके स्वभाव से बिलकुल प्रतिकूल। परन्तु उन्होंने उसे सहजरूप
में स्वीकार कर लिया। वहाँ रहते हुए भी उन्हें कई कार्यकर्ता स्वयं सपरिवार उन्हें
मिलने आते। इसमें भी एक विशेषता थी कि जब उनकी आयु 80 से अधिक थी तब मिलने आनेवालों में युवकों की संख्या सबसे
अधिक थी। वे युवकों के मित्र थे।
जो कोई मिलने आते,
बालासाहब प्रेम से सबकी पूछताछ करते। घर-परिवार
के क्षेम कुशल पूछते। हृदय के उस संवाद का वर्णन करने शब्द असमर्थ है। निरपेक्ष
भाव से मिलने का क्रम जीवन के अंतीम दिनों तक चलता रहा।
जीवन के अंतीम
दिनों में बालासाहब जब नाशिक कार्यालय में थे तो एक दिन संघ के प. पू. सरसंघचालक डा. मोहनराव भागवत अपनी व्यस्तता के बीच नाशिक उन्हें मिलने
पधारे। वैसे कई समय से पक्षाघात के कारण बालासाहब बड़ी असहायता अनुभव कर रहे थे।
परन्तु उस दिन संघ की काली टोपी पहनकर, बडे़ प्रसन्न चित्त से वे बैठे थे। स्वयं सरसंघचालक मिलने आए, इससे अधिक एक कार्यकर्ता के नाते और क्या चाहिए
! बालासाहब के पास अंतर मन में एक आनंद की अनुभूति और चेहरे पर हास्य था। एक-दूसरे
को मिलने के कारण समाधान उभय पक्ष में था।
आज हम सबके बीच
में बालासाहब नहीं है। अनेक कार्यकर्ताओं को एक खालीपन का अनुभव हो रहा है। परन्तु
हम सबके पास जीवन के अंतीम दिनों तक इस ईश्वरी कार्य में कार्यरत रहने का संकल्प
भी मन में है। चाहे डाक्टर हेडगेवार हो, बालासाहब देशपाण्डे हो या बालासाहब दीक्षित, सभी ने अपने जीवन से एक ही संदेश दिया है-समाज रूप में
ईश्वर की आराधना ही हमारे जीवन का लक्ष्य है।
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-----------ये है कार्यकर्ताओं ने व्यक्त किये हुए कुछ स्फूट विचार-----------
आजकल हम मोबाईल सेवा के चलते किसी भी व्यक्ति से तुरंत बात कर सकते है। पहले व्यक्ति से संवाद का प्रभावी साधन था - पत्र। बालासाहब ने अनेक कार्यकर्ताओं को पत्र लिखे है। उनका पत्र-लेखन यानी सीधा हृदय से संवाद। कई कार्यकर्ताओं ने आज भी उन पत्रों को सम्भाल के रखा है।
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गाडी में पेट्रोल कम पड गया तो हम जैसे पेट्रोल पम्प पहुँच जाते है वैसे विचारों का पेट्रोल पम्प थे-बालासाहब। कार्यकर्ता उन्हें मिलने कहीं पर भी पहुँच जाते थे।
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कल्याण आश्रम का कार्य करने वाले एक कार्यकर्ता
स्थानीय शिक्षा संस्था के संचालक मण्डल में कार्यरत हुए। बालासाहब को आकर मिलने पर बालासाहब ने कहा कि क्या हम वहाँ के डाक्टर हेडगेवार बन सकते है ?
वैसे भी कार्यकर्ताओं ने अपने अपने क्षेत्र में डाक्टर हेडगेवार बनना, यही अपेक्षा है।
बालासाहब एक एसा व्यक्तित्व था कि जिसने अनेकों कों व्यक्तिगत जीवन में आगे बढ़ने की ऊर्जा दी, समाज जीवन के लिए काम करने की दिशा दी।
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बालासाहब का समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों के साथ जैसा सम्बन्ध था वैसे संगठन में साधारण कार्य कर रहे व्यक्ति से भी उतना ही आत्मीय सम्बन्ध रहता था। अपने कार्यालय में एक रसोईया राजस्थान से था। बालासाहब स्वास्थ्य ठीक न होते हुए भी नाशिक से राजस्थान के सुदूर वनवासी गाँव में उस रसोईया के पुत्र के विवाह निमित्त पहुँच गए। उनका यह प्रवास मानो कहता था-जहाँ हृदय में प्रेम है वहाँ प्रवास का अंतर दूर नहीं होता।
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नाशिक की महिला कार्यकर्ताओं ने कार्यालय पर
बालासाहब दीक्षित जी का जन्मदिवस मनाया






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