जंगल टुरिजम नई कल्पना, या नया संकट ?


जंगल टुरिजम 
नई कल्पना, या नया संकट ?

- आनंद



इशिता खन्ना पर्यटन उद्योग में एक युवा नाम। ये महिला उद्योजक पर्यटाकों को घर जैसी सुविधा देने में जानी जाती है। उनके द्वारा ग्रामीणों को इसके लिए प्रशिक्षित भी किया गया। पर्यटाकों को मिले अच्छी सुविधा और ग्रामीणों का हो आर्थिक लाभ ऐसे दो लक्ष्य एक साथ। हिमाचल के वन क्षेत्र मंे प्रारम्भ हुए इस टुरिझम उद्योग का विस्तार अब मध्यप्रदेश और कर्नाटक के जंगलों में होने जा रहा है। पहले कभी सिक्किम और लद्दाख में इसे सफलता मिली है। शहर में रहनेवाले जंगलों में घूमने जाने का प्रतिशत जैसे बढ़ते जा रहा है, वैसे ही इसका महत्व बढ़ते जाएगा।

कैसा विरोधाभास है, देखिए! जंगल में रहने वालो की आवश्यकता बहुत कम रहती है। वे थोडे़ मंे गुजारा कर लेते है और शहर में रहने वालों को थोड़ी सी भी असुविधा नहीं चलता। तुरंत अस्वस्थ हो जाते है। जो मिला उसमें समाधान मानने का तो वनवासियों से ही सिखें।


सरकार की स्टार्ट-अप् योजना अंतर्गत भी इसे प्रोत्साहन मिलने के समाचार है। जैसे-जैसे आर्थिक लाभ होगा, जंगल में रहने वाले व्यक्तियों का आकर्षण बढ़ते जाएगा। पर्यटन स्थलों पर हाॅटेल-रिसोर्ट में रूकना ये कोई नई बात नहीं है। परन्तु व्यक्ति जब घर से दूर किसी जंगल में घूमने निकला हो, प्रकृति का आनंद लेने निकला हो और उसे हाॅटेल के बदले बिलकुल घर जैसी व्यवस्था मिल, तो किसको पसंद न आए! इसके कारण अब आकर्षण बढ़ते जा रहा है। इसका व्यावसायिक स्वरूप भी कई व्यक्तियों को रोज़गार के अवसर उपलब्घ कराएगा।
वैसे देखे तो ये कल्पना अच्छी है परन्तु क्या भविष्य के लिए एक संकट भी हो सकती है ? इसे विचार करने की आवश्यकता है।
वैसे पर्यटन मानव का स्वभाव है। भारत में भी लोग देश की चारों दिशाओं में देव-दर्शन के बहाने जाते रहते है। इसमें एक पुण्यप्राप्ति के भाव तो है ही, परन्तु साथ में समाज जीवन के दर्शन भी होते है। वैसे देखें तो ये बात थोड़ी पुरानी हो गई।
समय के चलते अब इसमें थोड़ा परिवर्तन भी देखने को मिल रहा है। वर्तमान समय की बात कहे तो समाज में ऐसे भी लोग है जो आनंद प्राप्त करने के लिए घूमने जाते है। रोज़-बरोज़ की ज़िदगी में बदलाव के लिए घूमने जाते है। कोई सागर किनारे जाता है, तो कोई हिल स्टेशन पर, कोई पर्वतारोहण करता है तो कोई जंगल सफारी में घूमने निकल पड़ता है।
 ऐसे में दो-पाँच दिन जंगल में जाने वाले, एकाद टेन्ट मंे रहकर अलग से, जरा हट कर आनंद लेते है। वहाँ यदि किसी ने घर जैसा खाना दिया, घर जैसी रहने की सुविधा दी तो वह सबको बहुत पसंद आती है।
फिर इसमें संकट कहाँ है ? पहली नज़र मंे तो ये ध्यान में ही नहीं आता। जब कोई नगरीय समाज जंगल में जाता है, तो जाने अनजाने में कुछ बुरी आदतों को भी साथ ले जाता है। नगर के लोग जंगल में रहने वालों को गवाँर समझते है। वास्तव में जो वनवासी उनकी वहाँ व्यवस्था करता है उससे नगरजनों ने कुछ सीखना चाहिए। कुछ अच्छी आदतों का अनुसरण करना चाहिए।
कैसा विरोधाभास है, देखिए! जंगल में रहने वालो की आवश्यकता बहुत कम रहती है। वे थोडे़ मंे गुजारा कर लेते है और शहर में रहने वालों को थोड़ी सी भी असुविधा नहीं चलता। तुरंत अस्वस्थ हो जाते है। जो मिला उसमें समाधान मानने का तो वनवासियों से ही सिखें।
एक बार ऐसे ही बात चली-एक ने कहा आज यदि थोड़ा पैसा कमाया तो वनवासी को कल की कोई चिंता नहीं। ये बात किसी वनवासी ने सुनली। उसने कहा वनवासी का भगवान पर पूरा भरोसा है। जो परिश्रम करने को तैयार है उसे भगवान देता ही है। जैसे आज दिया वैसे कल भी देगा। तो चिंता किस बात की! जीवन का ये कितना बड़ा सिद्धान्त है। उसे सहज रूप में चरितार्थ करने वाले व्यक्ति को नगरजन गवाँर मानते है। ये विपर्यास नहीं तो और क्या ?
कुछ बातें ऐसी रहती है कि व्यक्ति एक-दूसरे से सीखते है। अच्छी बातें सीखे तब तक तो ठीक है। परन्तु जंगल टूरीजम के कारण जंगल में रहनेवाले व्यक्तियों की कुछ आदतें भी बदल जाएगी। उसके जीवन जीने के तरीके बदल जाएंगे। आज वो जिस प्रकार रह रहा है उससे मानसिक रूप में सुखी है परन्तु जैसी ही नगरजनों जैसी कुछ आदतें सीख लेगा तो विचारा  दुःखी होगा। इस बात की सबसे ज्यादा चिंता होती है।
जैसे ही हम ये बात कहते है तो कुछ लोग तर्क करने लगते है। तो आप वनवासी को वैसा ही रखना चाहते हो, जैसे आज है। उसका भी तो विकास होना चाहिए। वह भी तो आगे आना चाहिए। वे झुपड़ी में ही क्यों रहेंगे ? उनको भी तो सारी सुख-सुविधा मिलनी चाहिए। सुनने के लिए तो अच्छा लगता है। परन्तु मूलभूत फर्क ये है कि हम वनवासी को दुःखी रखना नहीं चाहते। वह सुखी-आनंदी रहे तो न केवल हमें सभी को अच्छा लगेगा।


वास्तव मंे उसकी जीवन शैली को हमें समझना चाहिए। जंगल में रहने वालों की शैली को नगर के साथ जोड़ना नहीं चाहिए। जंगल के अनुरूप जीवन शैली के कारण वे सुखी है, इस बात को समझना चाहिए। नगरजन जंगल में घूमने जाएंँगे और वहाँ की जीवन शैली को पिछड़ी मानेंगे तो ये बहुत बड़ी गलतफैमी होगी। 

नगरजन घूमने के बहाने, जंगल में जाने में और एक समस्या है। कहीं जंगल मंें सिंगल युज प्लास्टिक यानी प्रदूषण न पहँुच जाएँ। नगरों में तो आज ये समस्या है ही। जंगल में थोडी कम है परन्तु जितने पर्यटन स्थल है वहाँ प्रदूशष होता ही है। यदि जंगल टूरिजम के बहाने नगर के लोग जंगल में जाएंगे तो प्रदूषण वहाँ भी बढ़ जाएगा। इसके लिए नियम-कानून तो है परन्तु उसका पालन करने की आदत भी तो होनी चाहिए। इसमें आयोजकों की बड़ी भूमिका होगी। उनके आयोजन में ही सिंगल यूज प्लास्टिक के बदले पर्यावरण को पूरक ऐसी चिजों का उपयोग होगा, तो प्लास्टिक का प्रमाण अपने आप कम हो जाएगा।
एक अनुभव - एक बार नगरजनों की एक टोली चिकित्सा शिविर के लिए जंगल के गाँव में गई। मन में भाव तो था सेवा का। परन्तु जनजाति जीवन की कोई जानकारी नहीं थी और जनजाति समाज के बारे में गलत जानकारी अधिक थी। वहाँ गाँव में हम स्वच्छ पानी नहीं मिलेगा। पता नहीं उनके पानी के मटके को वे कब धोते होंगे। इसलिए साथ में आनेवाले डाॅक्टर ने सूचना दी -साथ मंे बिसलरी की बाॅटल ले लो। सब बड़े उत्साह से वहाँ पहुँच गए। जिस वनवासी घर में गए वहाँ यजमान ने आते ही सबको पानी दिया। उसमें से एक युवक तुरन्त घर मंे  अंदर देखने को गया कि ये लोग पानी किस मटके में रखते है। वहाँ अंदर का चित्र देख कर
तो वह अच्मबित हो गया। उस घर की महिला ने घर आनेवाले महेमानों को स्वच्छ पानी मिलना चाहिए इस भाव से बर्तन को धो कर उसमें पानी उबालकर, सफेद कपडे़ से छान कर उनके लिए रखा था। देने वाले के मन में भाव था आनेवाले को कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए। परन्तु आनेवाले को ये पता नहीं था कि उनकी कितनी चिंता करते है। उन्होंने उन बोतलांें को वैसे ही रख लिया और न केवल पानी परन्तु वनवासी के प्रेम को पीया। अच्छा हुआ वे साथ लायी बोतलों को जंगल में छोड़ न आए।
एक और ख़तरा है, प्रदुशण के चलते मानव जीवन की तरह जंगल को भी नुकसान होगा। प्रकृति के मूल रूप के लिए बड़ा भारी संकट होगा। हमें वहाँ के पेड़-पौधें, वन्यजीव सहित समस्त सृष्टि को हरा-भरा रखना है। परिसरीय संतुलन को संजोए रखना है। ऐसे में जंगल टूरिजम से जुडे़, धूमने जाने वालों ने विशेष सावधानी रखने की आवश्यकता है। साथ-साथ टूरिजम के आयोजकों ने भी प्रारम्भ से कुछ सूचनाओं का कड़काई से अमल करना होगा।
जंगल टुरिजम को बढ़ावा मिले, वहाँ रहनेवालों को रोज़गार मिले, उसमें आनंद तो है परन्तु नगरजन जंगल मेें रहने वालों की जीवन शैली को समझे और उनसे कुछ सीख कर लौटे तो सोने पे सुहागा। अन्यथा कुछ वर्षों बाद टुरिजम के चलते जंगल और वहाँ रहने वाले ही बदल जाएंगे और नगर जैसे प्रदुशष की समस्या वहाँ पर भी आज से अधिक देखने को मिलेगी।
इससे तो आप भी सहमत हो जाएंगे की ये जंगल टुरिजम की कल्पना आज नई है परन्तु इसे हम संकट में परिवर्तित न होने दे। 

Comments

  1. लेख समसामयिक व अच्छा है।वनवासी बन्धुओं के हितों की चिंता करता है।कुछ वर्तनी की अशुद्धियाँ हैं।

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